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Tuesday, 1 January 2019

भक्तामर स्तोत्र : उच्चारण विधि एवं श्लोक 1 & 2 के भाव



नववर्ष की हार्दिक मंगलकामनाएं!

भक्तामर स्तोत्र के शुद्ध उच्चारण की टैक्नीक हमनें अपने religiousraaga channel पर देना प्रारम्भ किया है। आप वहाँ से शुद्ध उच्चारण को सीख-समझ सकते हैं।इसकी Link नीचे भी दी गयी है।

आचार्य मानतुंगसूरिजी ने इस स्तोत्र में प्रभु आदिनाथ के गुणों और रूप की अत्यन्त अनुपम व्याख्या की है। इनके भावों को जब गहनरूप में जानने का प्रयास करते हैं तो अंतर में एक दिव्यता का अनुभव होने लगता है।

प्रथम दो श्लोक युग्म श्लोक कहे जाते हैं जिनमें आचार्यश्री ने प्रभु को विनयपूर्वक वन्दन् किया है। तथा प्रभु के दिव्य चरणों के गुणों को समझाया है। आचार्य कहते हैं - मैंनें प्रभु ! आपके दिव्य चरणों के स्पर्श से देवों के मुकुटों की मणियाँ प्रकाशित हो उठीं। अर्थात् आपके दिव्य चरणों के पावन स्पर्श मात्र से अंतर के कषाय रूपी अन्धकार का पूर्ण नाश हो जाता है। और आत्मा अपने शाश्वत दिव्य गुणों से प्रकाशित हो उठती है। मैंने आपके उन दिव्य चरणयुगल का आलम्बन लिया है। मेरे अंतर के सभी कषाय-पाप समाप्त हो गये अतः निश्चय ही मेरे भव-भव के पाप-कर्म क्षीण हो गये हैं।

यदि हम प्रभु के चरणों में पूर्ण भाव से अपने आप को समर्पित करते हैं और विनयपूर्वक वन्दन करते हैं तो हमारे सभी पूर्व संचित पाप-कर्म क्षीण हो जाते हैं। हम जो भी कष्ट आदि भोगते हैं वह हमारे ही संचित पाप-कर्मों का प्रतिफल ही है।

प्रथम श्लोक का विनयपूर्वक,  नीचे दिये गये भावों के साथ यदि नियमित सुबह उठते ही, पठन करते हैं तो कुछ ही महीनों में हम अनुभव करेंगे कि हमारी विपदाएं, रुकावटें, तकलीफें स्वतः ही दूर हो रही हैं।


भाव इस प्रकार हैंः हे जिनेश्वर ! मैं पूर्ण भक्तिपूर्वक, समर्पित होकर, आपके दिव्य चरणों में वन्दन्, नमन कर रहा हूँ। मैंने अपने आपको आपके चरणों में समर्पित कर दिया है। आपके दिव्य चरणों का सहारा लिया है। आपके दिव्य प्रभाव और आशीर्वाद से मेरे अंतर के समस्त कषाय समाप्त हो रहे हैं, मेरी आत्मा ज्ञान ज्योति से प्रकाशित हो रही है, मैं दिव्य आत्म शक्ति का अनुभव कर रहा हूँ। मेरे भव-भव के संचित पाप-कर्म समाप्त होते जा रहे हैं।

द्वितीय श्लोक के भाव इस प्रकार हैंः हे प्रभु! मैं इन्द्र जितना ज्ञानी नहीं हूँ फिर भी मैं आपकी स्तुति का संकल्प करता हूँ। क्योंकि मैं भी आपका भक्त हूँ। 

इस श्लोक का पूर्ण भक्तिभाव से नियमित भाववन्दन् स्वयं में विश्वास एवं दृढ़ संकल्प शक्ति की जागृति करता है।
 

नोटः भक्तामर स्तोत्र के शुद्ध उच्चारण टैक्नीक के वीडियो  religiousraaga channel पर नियमित आते रहेंगे। आप चैनल subscribe कर, Regular updates प्राप्त कर सकते हैं।

यदि प्रथम दो श्लोकों के दिव्य प्रभावों के विषय में और अधिक जानने की आप जिज्ञासा रखते हैं तो आप ईमेल पर मुझसे संपर्क कर सकते हैं।
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राजेश सुराना (पुणे)  E-mail : religiousraaga@gmail.com                         

Wednesday, 26 December 2018

भक्तामर स्तोत्र : शुद्ध उच्चारण का महत्व

आचार्यश्री मानतुंगसूरि जी की इस महान रचना के विषय में आप सभी परिचित होंगे। इस स्तोत्र की रचना लगभग 1000 वर्ष पूर्व राजा भोज के काल में हुई। इसकी रचना के विषय में अनेकों कहानियाँ प्रचलित हैं। लेकिन सभी का सार यही है कि आचार्यश्री प्रभु ऋषभदेव के ध्यान में इस प्रकार तल्लीन हो गये कि एक-एक श्लोक की रचना होती गयी और एक-एक कर बेड़ियाँ टूटती गयीं।

भक्तामर स्तोत्र विनय, समर्पण और भक्ति का एक अनुपम उदाहरण है। भक्तामर स्तोत्र अर्थात आत्मा-परमात्मा का सम्मिलन, उसका दर्शन और चिन्तन है।
 
इस स्तोत्र में आचार्यश्री ने परमात्मा के अनुपम गुणों का और वीतरागभाव का बहुत ही सुन्दर वर्णन किया है। भक्तामर स्तोत्र का प्रक्येक श्लोक अपने आप में अतुल्य है, अद्भुत है, दिव्यता से परिपूर्ण है।

हम सभी ने गुरुभगवन्तों से सुना है कि प्रत्येक आत्मा में अनन्त-ज्ञान, अनन्त-दर्शन, अनन्त-सुख, अनन्त-शक्ति विद्यमान है।

भक्तामर स्तोत्र के विनय, समर्पण और भक्तिभाव पूर्ण शुद्ध वाचन से उत्पन्न नाद हमारे अंतर में छिपी हुई इस अमोघ शक्ति को जागृत करने लगता है। विनय और समर्पण भाव से की जाने वाली इस भक्ति प्रक्रिया में शरीर में दिव्य ऊर्जा का ऊजागरण होता है जो हमारे आत्मिक उत्थान के साथ-साथ अभीष्ट सिद्धी का कारक बनता है।

हम अक्सर यह अनुभव करते हैं, सुनते हैं कि अमुक स्तोत्र के पाठ से ये लाभ होगा, वो लाभ होगा परन्तु उसके जप आदि के बाद भी वांछित प्राप्ति न होने पर निराशा और अश्रद्धा के भाव मन में आने लगते हैं।

क्या हमनें इस बात पर गंभीरता से विचार किया है कि इसके पीछे क्या
कारण हो सकता है?

इसका कारण है आज विनयशीलता, समर्पणभाव और श्रद्धा के साथ-साथ स्तोत्र एवं मंत्रों के सही उच्चारण और भावों की जानकारी का अभाव।

जब तक हम स्तोत्र पाठ करते हुए उसमें तल्लीन नहीं होते, उसके भावों को आत्मा में उतारना शुरु नहीं करते और शुद्ध उच्चारण की जानकारी नहीं रखते तब तक हमारे अंतर में उस दिव्य ऊर्जा के जागरण में हम सफल नहीं हो सकते।

हमारे देश में संस्कृत के महानतम व्याकरणविद हुए हैं आचार्य पाणिनी। उन्होंने एक श्लोक में उच्चारण शुद्धता का महत्व कुछ इस प्रकार बताया हैः
मन्त्रो हीनः स्वरतो वर्णतो वा मिथ्या प्रयुक्तो न तदर्थमाह ।

 स वाग्वज्रो यजमानं हिनस्ति यथेन्द्रशत्रुः स्वरतोऽपराधात् ।।
अर्थात् - स्वर (accent) अथवा वर्ण से अशुद्ध उच्चरित हीन मन्त्र उस अर्थ को नहीं कहता (जिसके लिए उच्चारण किया जाता है) । वह वाग् रूपी वज्र यजमान को नष्ट करता है, जैसे स्वर के अपराध से इन्द्रशत्रु ने किया ।
 त्वष्टा नाम के असुर ने अपने पुत्र वृत्रासुर की वृद्धि के लिए एक यज्ञ किया था, जिसमें “इन्द्रशत्रुर्वर्धस्व” (अर्थात् इन्द्रशत्रु की वृद्धि हो) मन्त्र में इन्द्रशत्रु पद का उच्चारण “इन्द्रः शत्रुर्वर्धस्व” पद के रूप में कर दिया गया, जिससे इन्द्र वृत्रासुर का शत्रु (मारनेवाला), यह अर्थ प्रकट हो गया । फलतः इन्द्र द्वारा वृत्रासुर मारा गया ।
     [ सन्दर्भः पं० युधिष्ठिर मीमांसक (1985):"वैदिक-स्वर-मीमांसा", पृ० 55 ]

सरल शब्दों में, अशुद्ध उच्चरित मंत्र उस अर्थ को नहीं कहता जिसके लिए उच्चारण किया जाता है। अशुद्ध उच्चारित मंत्र साधक को लाभ के स्थान पर हानि पहुँचा सकता है।

एक और उदाहरण हमें मिलता है कुम्भकरण का। जिसने ब्रह्मा से वरदान में इंद्र आसन मांगते समय गलती से इंन्द्रासन की जगह निंद्रासन का गलत उच्चारण कर वरदान को अभिषाप में बदल लिया था।

इसी प्रकार गलत उच्चारण के दुष्प्रभाव के अनेकों उदाहरण हमें शास्त्रों में मिल जाते हैं।

हम इस महान स्तोत्र के शुद्ध उच्चारण की सरल विधि को समझेंगे, तत्पश्चात् इसके भावों को समझते हुए अपने आत्म उन्नति के पथ पर आगे बढ़ेंगे। आपके मूल्यवान सुझाव सादर अपेक्षित हैं। - राजेश सुराना (पुणे)